सोमवार, 30 अगस्त 2021

चुनाव के बहाने

 चुनाव के बहाने.... कुछ चुनाव की कुछ समाज की।

मैंने कम समय में चुनाव के काफी अनुभव प्राप्त किये हैं। सन् 2017 में मेरी नियुक्ति शिक्षा विभाग में व्याख्याता के पद पर हुयी, तब से मैंने विधान सभा, लोक सभा, नगर निकाय और शहरी निकाय के चुनाव के साथ-साथ एक बार नगर पालिका मतगणना में भी भाग लिया है।

         और चुनाव से कुछ न कुछ नया सीखने को ही मिलता है, हालांकि चुनाव से पूर्व यह भी होता है-काश मेरी डयूटी न आये। पर ऐसा होता नहीं है। और मेरी आज तक किसी भी चुनाव में डयूटी न आयी हो ऐसा नहीं हुआ। और इस बार दिनांक 13.08.2021 को राज्य चुनाव में जिला परिषद और डायरेक्टर के चुनाव के लिये बुलावा पत्र आ ही गया।

         17.08.2021 को शांतिवन, आबू रोड़ में एक छोटी सी ट्रेनिंग के पश्चात दिनांक 28.08.2021 को हमारे विद्यालय के स्टाफ पंकज मकवाना जी की कार में शिवांश दीक्षित जी और माउंट के ही हर्षित सर और दिनेश जी  के साथ हम सुबह सात बजे माउंट से सिरोही के लिये रवाना हुये।

       तय समय पर हम प्रशिक्ष स्थल खण्डेलवाल भवन पहुंचें। यहाँ नाम मात्र की ट्रेनिंग के बाद हमें अपना चुनाव सामान प्राप्त करना था। सामान प्राप्त करना और फिर उसे जमा करवाना तो चुनाव से भी दुष्कर कार्य है। कुल 85 प्रकार के सामान की सूची थी। जिसे देखना और मिलान करना और भी झंझट का कार्य है। अगर कोशिश की जाये तो चुनाव को आसान बनाया जा सकता है, पर यह कोशिश करे कौन? सब एक निश्चित ढर्रे पर चल रहे हैं। चुनाव में इतने प्रपत्र होते हैं, जिनको भरना भी बहुत साथियों के लिये चुनौती है। इस से तो अच्छा है एक बुकलेट बना दी  जाये और उसे भर कर जमा करवा दिया जाये।

मंगलवार, 20 जुलाई 2021

365 झरोखों का हवामहल

365 झरोखों का हवामहल

राजस्थान की राजधानी जयपुर अपनी ऐतिहासिक और स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध है। अपनी स्थापना आमेर से लेकर वर्तमान जयपुर शहर तक इसने विविध रुपों में स्वयं का श्रृंगार किया है। कभी आमेर था तो कभी गुलाबी नगरी तो कभी जयपुर।
      जयपुर अपनी प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना समेटे हुये है। यहाँ के विभिन्न महल और मंदिर पर्यटकों को सहज ही आकृष्ट करते हैं।
    जयपुर शहर के हृदय स्थल में स्थापित है हवामहल। यह अपने नाम के पूर्णतः अनुरूप है। 

हवामहल- जयपुर
 हवामहल- जयपुर
दिनांक 20.07.2021 को मैं अपनी अर्द्धांगिनी कर्मजीत कौर के साथ हवामहल घूमने का विचार बनाया और दोपहर को हम लगभग 12:30 PM हवामहल पहुंचे।
   मैं पिछले दो दिन से जयपुर ही था। वैसे हवामहल का यह मेरा द्वितीय भ्रमण है इस से पूर्व मित्र अंकित के साथ यहाँ आ चुका हूँ।
  हम दोनों ने  टिकट खिड़की से सौ रुपये में दो टिकट ली। और हवामहल में प्रवेश किया।
  
       अब कुछ हवामहल के इतिहास पर दृश्य डाल लेते हैं।  प्रवेश द्वार पर एक शिलापट्ट था जिस पर निम्नांकित जानकारी दी गयी थी।

'बड़ी चौपड़ स्थित हवामहल का निर्माण जयपुर के महाराजा सवाई प्रताप सिंह(1778-1803) ने 1799 ई. में करवाया था। इसके वास्तुकार उस्ताद लालचंद थे।
    इस दो चौक की पांच मंजिली इमारत के प्रथम तल पर शदर ऋतु के उत्सव मनाये जाते थे। दूसरी मंजिल जड़ाई के काम से सजी है, इसलिए इसे रतन मंदिर कहते हैं। तीसरी मंजिल विचित्र महल में महाराजा अपने आराध्य श्री कृष्ण की पूजा/आराधना करते हैं। चौथी मंजिल प्रकाश मंदिर है और पांचवी हवा मंदिर जिसके कारण यह भवन हवामहल कहलाता है। 

रविवार, 10 जनवरी 2021

बेमाली माता की यात्रा

बेमाली माता पर्वत की यात्रा
माउंट आबू-सिरोही

हमें यात्रा का जो समय मिलता है वह है रविवार। विद्यालय अवकाश का हम सदुपयोग घूमने में कर लेते हैं। माउंट आबू प्रकृति की गोद में बसा शहर है और यहाँ जंगल-पहाडों के अतिरिक्त मंदिर भी काफी संख्या में है। और जब कोई मंदिर पहाड़ की चोटी पर हो और वहां जाना हो तब रोमांच और भी बढ जाता है।   
हम दस
हम दस
माउंट आबू शहर में प्रवेश करते समय, टोल नाके से पूर्व दायी तरफ  काफी ऊंचा पहाड़ नजर आता है और उस पहाड़ पर एक मंदिर का हल्का सा आभास होता है। पहाड की ऊंचाई का आप अंदाज इस तरह भी लगा सकते हो की यह शहर की दूसरी तरफ नक्की झील से दिखाई देता है। जब आप नक्की झील के पास कृत्रिम झरने के पास झील की उतर मुँह करके बैठते हो तो शहर की दूसरी तरफ का बेमाली पर्वत अपनी ऊंचाई का अहसास दिलाता नजर आता है। तब मन में यही इच्छा बलवती होती थी की कभी इस पर्वत पर भी जाना है।
   दिनांक 10.01.2021 को रविवार था तो विद्यालय के बच्चों के साथ घूमने का विचार बनाया। सभी का मन बेमाली पर्वत का ही था। इस यात्रा में मेरे साथ शारीरिक शिक्षक अवधेशराज सिंह पंवार और बच्चों में कक्षा 12 के ललित राणा, कमलेश चौहान, सुनील पाल, प्रथम, विजेन्द्र सिंह तथा दिलीप कुमार और कक्षा 11 के दीपू पाण्डेय और यशपाल थे। आठ बच्चे और दो हम, कुल दस लोगों का समूह लगभग 11 बजे इस यात्रा पर निकला।  अवधेश सर के साथ यह पहली जंगल यात्रा थी, कुछ बच्चों के साथ पहले घूम चुके थे और कुछ बच्चों का साथ प्रथम बार था।
       
शिक्षक मित्र अवधेशराज सिंह पंवार के साथ

जंगल में घूमने का आनंद कुछ अलग ही होता है। चारों तरफ पेड़, चट्टान और कहीं-कहीं पानी का ठहराव आकर्षित करता है। पक्षियों का कलरव के साथ-साथ किसी नये जानवर के दर्शन की उत्कठा, तो वहीं किसी खतरनाक जानवर का अदृश्य सा डर भी होता है।

   जैसे ही हम जंगल में आगे बढे तो आगे एक पुरानी डामर की सड़क नजर आयी। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ की आखिर यह सड़क यहाँ, और आगे कहां जाती है। वहाँ घूम रहे कुछ स्थानीय लोगों ने बताया की यह सड़क के होटल से आरम्भ होकर आगे एक मैदान तक जाती है। होटल में ठहरे लोग इधर घूमने आते हैं। यह बात तुरंत सत्य होती नजर आयी, क्योंकि आगे मैदान से कुछ लोग घूम कर वापस आ रहे थे। यहाँ से बेमाली पर्वत को देखना और भी रोचक लगा।  
नेपथ्य में बेमाली पर्वत
   एक ऊंचा पहाड़, हरा-भरा, अपना सीना ताने  खड़ा था। हमें इस पर्वत की हरियाली को पार करते हुये इसकी चोटी पर पहुंचना था। चित्र में देखने में यह प्रतीत हो सकता है की यह पर्वत तो छोटा सा है और नजदीक है। पर जो पहाड़ की यात्रा करते हैं उनको वास्तविकता का पता है। 
   कुछ समय पश्चात हम पर्वत के नीचे उपस्थित थे। यहाँ से पर्वत की ऊंचाई आरम्भ होती है। यहाँ से बड़े पेड़ खत्म हो जाते हैं और आगे झाड़ियां ही‌ मिलती हैं।
    हम जैसे -जैसे पहाड़ी पर चढते गये वैसे-वैसे थकान हावी होती गयी। बच्चे तो अकसर पहाडों पर घूमते रहते हैं, इसलिए वे शीघ्रता से ऊपर चढते गये लेकिन मैं और अवधेश जी सबसे पीछे थे। धीरे-धीरे, सुस्ताते हुये, आराम करते हुए हम आगे बढ रहे थे।
    बच्चे आगे एक चट्टान पर बैठे हमारा इंतजार कर रहे थे। यहाँ से शहर और पहाड़ियों का दृश्य बहुत मनोरम‌ नजर आ रहा था। अधिकांश बच्चे तो फोटोग्राफी में व्यस्त थे। कुछ देर आराम‌ करने के पश्चात, फोटोग्राफी की और फिर आगे की वैसी ही कठिन यात्रा आरम्भ हो गयी। पूरी यात्रा के दौरान ललित राणा का फोटोग्राफी कला देखने को मिली। 
एक-दो-तीन-चार ऐसे करते-करते मेरे सारे साथी पुनः आगे निकल गये। बच्चों का जो उत्साह था वह उन में थकान को हर रहा था।
लगभग एक घण्टे की पहाड़ की यात्रा करने पर हम चोटी पर पहुँचे।  
बेमाली माता मंदिर
यहाँ बेमाली माता का सफेद रंग का एक छोटा सा मंदिर है। जिसके आगे एक सफेद वर्ण की ध्वजा लहरा रही थी।  पास में दो-तीन और चट्टानें हैं जिन पर सरलता से जाया जा सकता है। उन सभी चट्टनों पर केसरिया ध्वज फहरा रहे थे‌। वहाँ फैला प्लास्टिक कचरा यह भी बता रहा था कि यहाँ काफी संख्या में लोग घूमने आते हैं। मुझे हमेशा से इस बात से रोष आता है की लोग जहाँ घूमने जाते हैं वहाँ कचरा फैला देते हैं जो की वहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य को नुकसान पहुंचाता है। इस विषय में हमारा एक विद्यार्थी सुनील पाल बहुत सक्रिय है। वह कचरा न फैलाने के प्रति बहुत सचेत रहता है, यहाँ फैले कचरे को भी उसने यथासंभव एकत्र कर बैग में भर लिया।
  मंदिर में सिर नवा कर कर हम अगली पहाड़ी पर पहुंचे‌। यहाँ से माउंट आबू शहर बहुत रमणीय नजर आता है। शहर कर अतिरिक्त नक्की झील और upper कोदरा डैम, lower कोदरा डैम भी नजर आते हैं।
   चारों तरफ हरी-भरी पहाड़ियों, एक तरफ फैली हल्की धुंध और ठण्डी हवा ने सारी थकान को पल भर में खत्म कर दिया। 
    फोटोग्राफी का दौर तो खैर साथ-साथ चलता ही रहा। चाय की इच्छा महसूस हुयी पर साथ लायी चाय अब तक ठण्डी हो चुकी थी। विजेन्द्र सिंह ने बताया की इस पहाड़ी पर एक छोटी सी गुफा है। हमने उस गुफा में बैठ कर नाश्ता किया‌। गुफा में एक चांदर पहले से ही बिछाई हुयी थी। विजेन्द्र सिंह ने बताया की लोग यहाँ रात को भी ठहरते हैं, यह उनके लिए व्यवस्था है, स्वयं विजेन्द्र सिंह भी यहाँ कई रातें बिता चुका है।
           हालांकि बेमाली माता जी के विषय में ज्यादा जानकारी तो उपलब्ध नहीं हो पायी पर विद्यार्थी विजेन्द्र सिंह ने एक छोटी सी कहानी सुनाई वह यहाँ प्रस्तुत है। बेमाली माता विजेन्द्र सिंह की कुल माता है।
  एक बार एक चीता गाय को खा रहा था। तब बेमाली माता ने इस पर्वत से तीर छोड़ा जो नीचे चट्टान से टकराया और दूसरा तीर चीते के लगा और चीता वहीं मर गया। तब से बेमाली माता जी की पूजा होने लगी। जहाँ चीता मारा गया था वहाँ एक छोटा मंदिर बना है वह तीर भी सुरक्षित है जो चट्टान से टकराया था और वहाँ चीते के पंजों के निशान भी उपस्थित हैं। नीचे माउंट शहर में, टोल नाके के पास, छोटे मंदिर तो जाना संभव न था। वह फिर कभी।
    मुझे अक्सर प्राचीन स्थलों के पीछे छुपी कहानियाँ सुनना बहुत अच्छा लगता है। इसमें कितनी सत्यता होती है यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन जनास्था अवश्य होती है। यह लोगों की आस्था ही है जो एक ऊंचे पहाड़ पर मंदिर स्थापित किया जहाँ जाना ही दुर्गम है।

हम तीन बजे वहाँ से वापस चले। जहाँ इस पर्वत पर चढना जितना दुष्कर्म था वहीं उतरना उतना ही आसान था। उतरते वक्त ऐसा लग रहा था कहीं तीव्र गति के कारण पैर न फिसल जाये। हमारे कुछ साथी बहुत आगे चले गये थे। लेकिन मैं और कुछ अन्य विद्यार्थी सुरक्षा की दृष्टि से धीमे ही चल रहे थे और कुछ फोटोग्राफी के कारण समय लग रहा हैं।

   नीचे उतरने पर एक अलग ही सुकून था। ठण्डी हवा से सारी थकान खत्म हो गयी थी।
    बेमाली माता/पर्वत की यात्रा बहुत रोचक रही।
धन्यवाद।

- गुरप्रीत सिंह (व्याख्याता)
राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय- आबू पर्वत, सिरोही

11:00 AM घर से रवाना

12:30- पर्वत की चढाई
1:30 -  पर्वत पर पहुंचे
3:00 -  वापसी 
बायें से- कमलेश चौहान, प्रथम, गुरप्रीत सिंह, यशपाल, दीपू पाण्डेय, सुनील पाल



रविवार, 25 अक्तूबर 2020

गौमुख यात्रा- माउंट आबू

गौमुख यात्रा- 28.01.2018 रविवार

श्याम सुंदर, मनोज राजोरा, सुरेश कुमार

माउंट आबू एक हिल स्टेशन के रूप में प्रसिद्ध है, लेकिन यहाँ धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल भी बहुत हैं जो मुझे अक्सर अपनी तरफ आकृष्ट करते हैं। इसलिए जैसे ही हमें समय मिलता है हम मित्र घूमने निकल जाते हैं। अरावली पर्वल माला की गोद में बसे माउंट आबू के पर्यटन स्थलों पर जाना वास्तव में बहुत रोचक है और वह रोचकता तब और बढ जाती है जब पर्यटन स्थल घने जंगल में हो। ऐसा ही एक पर्यटन स्थल है गौमुख। 
         माउंट आबू शहर से बाहर ...दिशा में शहर से तीन किमी दूर स्थित है गौमुख।  रविवार विद्यालय अवकाश को हम मित्रों का कोई न कोई भ्रमण हो ही जाता है। मित्र श्यामसुंदर दास, मनोज राजोरा, सुरेश कुमार और मैं गुरप्रीत सिंह। हम लगभग 12:20PM घर से यात्रा को निकले। 
      शहर से बाहर घुमावदार रास्ता, चारों तरफ पहाडियां, घनी हरियाली आदि मनमोहक दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे। हम जैसे -जैसे मंजिल तरफ बढ रहे रास्ता वैसे-वैसे पहाङी पर चढता जा रहा था, ऊंचा होता जा रहा था। रास्ते में फोटो लेने के मजे भी गजब थे। जैसे ही कोई अच्छा दृश्य दिखा सभी उस और हो लेते।
         एक ऊंची पहाङी से गौमुख का रास्ता नीचे को उतरता है। अच्छी सड़क है तो पहाड़ी पर चढने का अहसास नहीं होता और उस पहाड़ी से लगभग पांच सात सौ से अधिक सीढियां उतरने पर गौमुख पहुंचे, हालांकि अधिकांश लोग सीढ़ियों की संख्या सात सौ से अधिक बताते हैं। लेकिन गौमुख जाने का उत्साह इन सीढ़ियों की परवाह कहां करता है। लेकिन गौमुख से वापस सीढियां चढने वालों के चेहरे इन यात्रा की मनाही करते नजर आये। हम उछलते-कूदते, फोटोग्राफी करते कब नीचे उतरे यह पता ही नहीं चला।