रविवार, 10 मार्च 2019

अगाई माता- ओरिया, माउंट आबू

रविवार का दिन अवकाश का दिन होता है। ये दिन या तो घर की साफ- सफाई में बीतता है या फिर कहीं घूमने में। रविवार 3.03.2019 को मैं और साथी मनोज कुमार भी घूमने निकले।
माउंट आबू का एक गांव है 'ओरिया'। वहाँ के विद्यालय में मनोज जी शिक्षक हैं। विद्यालय बच्चों का एक छोटा सा टूर बना घूमने का तो हमें भी बुला लिया। हमारे बाकी शिक्षक मित्र घर गये हुए थे। हम दोनों खाली थे, तो ओरिया चले गये।


            हम लगभग 11 AM ओरिया पहुंचे। कुछ समय बाद बच्चे भी आ गये। वे संख्या में आठ थे और दो हम, कुल दस।'
                 'गुरुशिखर खगोल भौतिक विज्ञान वैद्यशाला' के सामने से होता हुआ एक रास्‍ता जाता है 'अगाई माता मंदिर'। हमारा आज का कार्यक्रम भी इसी मंदिर का था। जंगल और पहाड़ियों के बीच से निकलता कच्चा-पक्का, अनगढ रास्ता कई छोटे-बड़े घूमाव के बाद हमें मंदिर ले गया।
जंगल का रास्ता
रास्ते का सफर हाल ज्यादा नहीं है, लगभग तीस-चालीस मिनट का सफर होगा, लेकिन रास्ते की हल्की-हल्की चढाई अवश्य परेशान करती है। जंगल के अंदर झाड़ियों के बीच से कुछ पगडंडियां सी निकलती दिखाई देती हैं, मैं जिन्हें देखकर अक्सर सोचता रहता हूँ के छोटे-छोटे रास्ते कौन बनाता है। तब एक बच्चे ने समाधान किया "सर, रास्ते भालू बनाते हैं। भालू अक्सर यहाँ घूमते हैं। वे इन रास्तों से जंगल में चले जाते हैं।"
                        रास्ते में एक जगह जमीन के अंदर एक गड्डा दिखाई दिया तो बच्चों ने बताया की भालू 'चिंटी, मकोड़े' आदि के बिल को खोदकर उ‌नको खा जाता है। यह किसी चिंटी आदि का बिल होगा जिसे भालू ने खोदा है।
भालू की करामात


                  बच्चों का साथ तो रास्ते को और भी मनोरंजन बना देता है, बच्चे स्कूल की चर्चा के साथ-साथ एक-दूसरे की शिकायतें भी करते चलते हैं। कुछ बच्चे एक दूसरे के किस्से भी सूना देते हैं।
एक पहाड़ी पर बना 'अगाई माता मंदिर' दर्शनीय है। हालांकि पहाड़ी ज्यादा ऊंची नहीं है, लेकिन वह पहाड़ी अपनी श्रृंखला की अंतिम‌ पहाड़ी है। इसी अंतिम पहाड़ी पर यह मंदिर स्थित है। उसके चारों तरफ और भी काफी छोटी-बड़ी पहाडियां नजर आती हैं। यहाँ से गुरु शिखर नजर आता है और माउंट आबू की तरफ के कुछ गांव भी।
                'अगाई माता' यहाँ के राजपूत समाज की देवी है। इसका इतिहास क्या है, यह तो खैर पता नहीं चला और बच्चों को भी इस विषय में कोई जानकारी नहीं। एक बात यह पता चली की पहले यह मंदिर छोटा सा था लकिन कुछ असामाजिक तत्वों ने इसका गुबंद तोड़ दिया और मंदिर को भी क्षति पहुंचाई। उसके बाद गांव वालों ने सहयोग से इस मंदिर का पुन: निर्माण किया। वर्तमान मंदिर भव्य और बड़ा है। इसी के साथ छोटा मंदिर में अवस्थित है।
अगाई माता मंदिर
            हम मंदिर की पहाड़ी पर घूमते कुछ देर घूमते रहे और फोटोग्राफी करते रहे। विभिन्न कोणों से फोटोग्राफी करने बाद हमने वापसी का रूख किया।
            वापसी में आते वक्त एक छोटा सा शिव मंदिर भी दिखाई दिया तो बच्चे उस मंदिर में भी ले गये। यह मंदिर भी रास्ते से हटकर एक पहाड़ियों के नीचे पानी के बहाव वाली जगह पर है।
         ‌वहाँ एक फलदार पौधा दिखाई दिया बच्चों ने बताया यह 'झमीरा' है। यह संतरे की तरह का एक खट्टा फल है।
झमीरा नामक फल

खेत, तालाब और पहाड़
मंदिर, पहाड़ आदि देखने बाद खेतों में कुछ देर घूमने बाद वापसी की।
हम तीन बजे के लगभग वापस घर पहुंचे। आज की यात्रा छोटी थी लेकिन अच्छी और मनोरंजन रही।


हम भी अच्छे लगते हैं।



सोमवार, 25 फ़रवरी 2019

Bailey's Walk का सफर

Bailey's walk का सुहाना सफर 

      माउंट आबू के प्राकृतिक सौंदर्य के विभिन्न रंग हैं। इन रंगों में डूबना बहुत रोचक है।  माउंट आबू अरावली की पहाडियों में बसा एक शहर है।  प्रकृति की गोद में बसा यह छोटा सा शहर और इस शहर को चारों तरफ से जंगल और पहाड़ियों ने घेर रखा है। इन पहाडियों के अंदर विभिन्न सौन्दर्यमयी जगह है ।‌ 

        ऐसी ही एक जगह है Bailey's walk की। यह एक रास्ता है जो लगभग 2.5 km लंबा है। यह सनसेट से आरम्भ होकर घने जंगल से गुजरता हुआ नक्की झील या टाॅड राॅक पर खत्म होता है। इस रास्ते का सफर करना बहुत रोमांच भरा है।

             रविवार के अवकाश का लाभ उठाते हुए हमने घूमने का कार्यक्रम बनाया।  विद्यालय परिवार से स्थानीय शिक्षक बंधु छोटे लाल जी(व्याख्याता-इतिहास), श्यामसुंदर दास(व्याख्याता- गणित), हुकमचंद नामा(व्याख्याता- काॅमर्स) और मैं गुरप्रीत सिंह (व्याख्याता- हिन्दी) । चारों लगभग 12:30PM इस रास्ते पर निकले।

        अगर माउंट आबू के प्राकृतिक सौन्दर्य का वास्तविक आनंद उठाना है तो बरसात का मौसम बहुत अच्छा होता है। हालांकि बरसात के समय  जंगल और पहाड़ी पर जाना खतरनाक भी है। लेकिन उस समय जो यहाँ हरियाली होती है वह अवर्णनीय है।

                 Bailey walk का जहाँ से आरम्भ होता है वहाँ का दृश्य भी अच्छा है। सपाट पहाड़ी पर फोटोग्राफी का आनंद लिया जा सकता है। इस रास्ते में  जैसे-जैसे आगे बढते गये वैसे-वैसे रोमांच भी बढता गया। हालांकि यह मौसम बरसात का नहीं है, इसलिए बहुत से पेड़-पौधे सूख चुके हैं। 

                    अगर इस रास्ते पर शाम के वक्त निकलते तो भालु, तेन्दुआ या अन्य कोई जंगली जानवर का डर ज्यादा रहता है। रास्ते में एक- दो गुफाएं भी आयी। संभवतः उनमें जानवर रहते हो।

                    जंगल का नयनाभिराम दृश्य, शीलत वायु, कलरव यात्रा को और भी आनंददायक बना देता है। पहाड़ी से नीचे गाँव दिखते हैं,  खेत नजर आते हैं, चारों तरफ फैली हरियाली नजर आती है।  इस रास्ते पर फोटोग्राफी का अपना अलग ही मजा है। कहीं विभिन्न आकृति लिए हुए पेड़ हैं तो कहीं पहाड़ी कुछ आकृति बनाये खड़ी है। कहीं से नीचे खेत नयन को सुकून देते हैं तो कहीं बादल फोटो में बहुत अच्छे आते हैं। 

कुछ प्राकृतिक दृश्य

    

                 

       इस रास्ते में एक छोटा सा परंतु दिल को सकून देना वाला स्थान है, कनैल कुण्ड। इसके नामकरण के पीछे क्या कारण यह तो नहीं पता।  मैं एक बार पहले भी कनैल कुण्ड तक आ चुका हूँ।

                     कनैल कुण्ड इस रास्ते के किनारे एक चट्टान पर  छोटा सा कुण्ड है जहाँ किसी ने एक शिव लिंग स्थापित कर दिया। इस कुण्ड में प्राकृतिक रूप से पहाड़ियों से पानी बह-बह कर आता रहता है। जब की बरसात हुये कई महिने बीत गये, बरसात के अभाव में पेड़-पौधे सूख गये पर यहाँ पानी निरंतर रिसता रहता है। जब मैं पहली बार यहाँ आया था तब मेरे मन में यह प्रश्न था की जब बरसात का मौसम नहीं होगा तब तो यह कुण्ड अवश्य सूख जाता होगा। लेकि‌न अब यह भ्रम दूर हो गया। 

                     जिस चट्टान पर यह शिव लिंग/कुण्ड स्थापित है उस पर से पानी रिसता रहता है, वहाँ उपर चढने के लिए कोई अच्छी व्यवस्था नहीं है।‌ सावधानी से उपर चढना पड़ता है। अगर हाथ-पांव फिसल गया तो फिर सीधा नीचे।  हम चारों मित्र सावधानी से उपर चढे। मेरे मन में एक प्रश्न आय वह पहला व्यक्ति कौन रहा होगा जिसने इस स्थल को खोजा और वह व्यक्ति कौन था जिसने यहाँ शिवलिंग स्थापित किया। वहाँ कुछ अगरबत्ती के पैकेट और माचिस भी थी। शिव की महिमा शिव ही जाने।

                     हम वहाँ कुछ देर रूके,फोटोग्राफी की  और पुन: सफर पर बढ चले।

         कुछ आगे चलने पर नक्की झील दिखाई देने लगती है। यहाँ से तीन रास्ते निकलते हैं। जो अनन्त: नक्की झील पर ही पहुंचते हैं। एक रास्ता 'अगाई माता' मंदिर होते हुए नीचे उतरता है दूसरा रास्ता सीधा नक्की झील पर उतरता है और तीसरा रास्ता 'टाॅड राॅक' होते हुए नक्की झील तक जाता है हमने यह तीसरा रास्ता चुना। इसी रास्ते पर बैठ कर नाश्ते का आनंद लिया। थकान के कारण और शीतल छाया में समोसे और कोल्ड ड्रिंक का मजा भी गजब था।

हालांकि हमें टाॅड राॅक नहीं जाना था इसलिए टाॅड राॅक के पीछे से निकल गये।

          यह सफर हम चारों के लिए बहुत मजेदार रहा।

चन्द्रावती- एक ऐतिहासिक स्थल

चन्द्रावती- एक ऐतिहासिक स्थल

22.02.2019 को आबू रोड़(ओर गांव में)  एक विवाह समारोह में जाना हुआ। इसी दौरान हमारे विद्यालय के पूर्व पुस्तकालय प्रभारी रणवीर सिंह चौधरी जी मिल गये। रणवीर जी आबू रोड़ के ही निवासी हैं। उनके साथ ऐतिहासिक स्थल चन्द्रावती देखने का सौभाग्य मिला।

           चन्द्रावती एक ऐतिहासिक स्थल है जो आबू रोड़ से लगभग पांच- छह किमी. दूर है। मेरा जहाँ भी जाना होता है, मेरी इच्छा होती है वहाँ की सभ्यता और संस्कृति को देखने और समझने की, वहाँ के धार्मिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थलों को देखने की। चन्द्रावती तो एक ऐतिहासिक स्थल है उससे वंचित कैसे रहते। मेरे साथ शिक्षक मित्र श्यामसुंदर जी, हुकमचंद नामा जी भी थे।
           विशाल क्षेत्र में इस जगह का फैलाव है। जो की तारबंदी और झाड़ियों से घिरा हुआ है।
           यहाँ एक कलादीर्घा है, जिसमें चन्द्रावती की खुदाई में मिली प्राचीन मूर्तियाँ रखी गयी हैं। इनमें से कुछ मूर्तियों खण्डित हैं तो कुछ सही अवस्था में भी हैं।
           कहीं योद्धा का सिर तो है लेकिन धड़ नहीं है, कहीं धड़ तो मौजूद है लकिन सिर गायब है। कुबेर जी भी उपस्थित हैं लेकिन खाली हाथ।
            माँ सरस्वती आसन पर विराजमान है लेकिन हाथ में  खण्डित वीणा है। कहीं विष्णु जी अधूरे हैं, कहीं गणेश जी तो कही कीचक महाराज। सब कुछ अधूरा -अधूरा सा मौजूद है, लेकिन यह अधूरापन भी अपने समय को पूरा करता है, यही अधूरापन हमें इतिहास की जानकारी उपलब्ध करवाता है।




            जहाँ पर खुदाई हुयी थी, उस जगह पर तार बंदी करके उसे सुरक्षित रखा गया है, लेकिन वहाँ इतनी झाडियां आदि हैं‌ की अंदर जाना संभव ही नहीं, हाँ स्थानीय ग्रामीण ईंधन के लिए यहीं से लकड़ियाँ काट कार ले जाते हैं। उनके लिए जगह-जगह बिखरे इन प्राचीन भग्नावशेष का कोई महत्व नहीं है।
         इस तारबंदी के अंदर असंख्य प्राचीन‌ मंदिर, घर आदि के भग्नावशेष बिखरे पड़े हैं। कभी कितने हर्ष और उंगम से ये घर बने होंगे, कितनी आशा और उम्मीद के बसेरे रहे होंगे। आज अपने खण्डहर हो चुके अस्तित्व को निहारते ये मंदिर कभी न जाने कितने लोगों के आस्था के केन्द्र रहे होंगे, लोगों की मन्नतों को पूर्ण करने वाले आज ये स्वयं अपूर्ण हैं।

              चन्द्रावती के विषय में जो ऐतिहासिक जानकारी प्राप्त होती है उसके अनुसार इस स्थल की खोज सन् 1822 में कर्नल जेम्स टॉड ने की थी।
      पुरातत्व विभाग द्वारा लगाये गये एक शीला पट्ट के अनुसार - चन्द्रावती 11-12 वी शताब्दी ई. में परमारों राजाओं की राजधानी थी। इस वंश में यशोधवल एवं धारवर्ष प्रतापी शासक हुये। इस नगरी में बड़ी संख्या में शैव-वैष्णव और जैन मंदिरों और राजप्रसादों का निर्माण हुआ।  सन् 1303 ई. तक यह नगरी परमारों के अधिकार में रही, तत्पश्चात यहाँ देवड़ा चौहानों का शासन राज्य हो गया।  वर्ष 1405 ई. से सिरोही राज्य की स्थापना होने तक यह स्थल देवड़ा चौहानों की राजधानी रहा।
            दिल्ली-गुजरात के मुख्य मार्ग पर स्थित होने के कारण इस समृद्धशाली नगरी चन्द्रावती को आक्रांताओं द्वारा अनेक बार लूटा गया तथा यहाँ स्थित मंदिरों को क्षतिग्रस्त किया गया।  इन मंदिरों के शिल्प और वास्तुखण्डों को  चन्द्रावती के वास्तुदीर्घा में प्रदर्शित किया गया है। यहाँ के मंदिरों की स्थापत्य शैली और भव्यता का चित्रों सहित वर्णन सन् 1922 ई. में सुप्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासकार कर्नल जेम्स टाॅड ने अपनी पुस्तक 'वेस्टर्न इण्डिया' में किया है।
         समय चक्र निरंतर चलता रहता है आज तो वैभवशाली है कल को वैभवहीन हो सकता है। शायद यही चन्द्रावती का भाग्य रहा है। अपने समय की एक वैभवशाली नगरी आज वैभवहीन है। 999 मंदिरों की नगरी तो स्वयं में वैभवशाली रही होगी लेकिन आज वे सब मंदिर अतीत हो गये, कुछ के अवशेष बाकी रहे हैं। वह भी टूट कर, जमीन पर,  गिर जाने के बाद।
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कलादीर्घा से एक चित्र


कलादीर्घा के अंदर भी कुछ जानकारी अलग-अलग शीर्षक  एकत्र की गयी है। जैसे 'लघु पुरावशेष'(Minor Object) में‌ लिखा है- विभिन्न प्रकार के लघु पुरावशेष जैसे पकी मिट्टी से बनी चूड़ियाँ एवं मनके, लोहे और तांबे से बने धातु के औजार, शीशे से निर्मित वस्तुओं के अवशेष एवं पकी मिट्टी से बनी मनुष्य और जानवरों‌ की मूर्तियाँ भी प्राप्त हुयी हैं। इसके अलावा पकी मिट्टी से बनी अनेक कलात्मक वस्तुएँ भी प्राप्त हुयी हैं जिनको संभवत मनोरंजन हेतु प्रयुक्त किया जाता रहा होगा।

         अपने समय की एक ऐतिहासिक और शौर्यवान नगरी चन्द्रावती अपने भग्नावशेष के साथ आज भी जिंदा है। कभी यहाँ भी सब आबाद था लेकिन आज चारों तरफ सन्नाटा पसरा है, जहाँ कभी फूल खिलते थे वहाँ आज कंटीली झाड़ियां है। बिता समय कभी लौट कर तो नहीं आता, लेकिन हम उस समय को यादों में, वास्तु में समेट सकते हैं।
             ऐतिहासिक स्थल चन्द्रावती को आज संरक्षण की आवश्यक है, स्थानीय प्रशासन भी अगर सजग हो, ग्रामीण अगर सचेत हो तो यह स्थल पूर्णतः सुरक्षित रह सकता है।
बायें से- रमेश पुरोहित जी, रणवीर चौधरी जी, गुरप्रीत सिंह, हुकमचंद नामा, श्यामसुंदर जी।



            

मंगलवार, 12 फ़रवरी 2019

पहाड़ पर क्राॅस


माउंट आबू में प्रसिद्ध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व के स्थलों के अलावा भी बहुत से छोटे-छोटे ऐसे स्थान है जो देखने योग्य हैं। ऐसे कई स्थान जो पुस्तकों में वर्णित नहीं, मैप पर नहीं और जहाँ पहुंचने के लिए सुगम रास्ता नहीं है।

                 ऐसा ही एक स्थान है 'पहाड़ पर क्राॅस'। माउंट आबू के प्रसिद्ध पोलो मैदान से एक पहाड़ी पर 'प्रभु यीशु का क्राॅस' नजर आता है। मेरे (गुरप्रीत सिंह) और मित्र मनोज कुमार राजोरा में कई बार इस विषय पर चर्चा होती थी कि उस पहाड़ी पर कब चलें। कभी समय न मिला, कभी इच्छा न हुयी तो कभी स्थानीय साथी न मिला जो उस पहाड़ी का रास्‍ता जानता हो।
                  रविवार (10.02.2019) को समय मिल ही गया। मैं, मनोज और हुकम नामा जी तीनों निकल पड़े।
                  "भाई, वहाँ जाने का रास्ता मुझे नहीं मालूम।"-मैंने कहा।
                  " जब निकल ही लिए तो रास्ता भी मिल जायेगा। किसी से पूछ लेंगे।"- हुकम‌ जी मे कहा।
                  इतना तो अनुमान था की क्राॅस वाली पहाड़ी गौमुख के रास्ते में आती है। एक बार जब हम गौमुख गये थे। तब वह क्राॅस देखा था। पहाड़ की एक यह विशेषता है की उस पर जो 'चीज' है वह दूर से तो नजर आती है लेकिन जब उसके पास पहुँचते हैं तो वह नजर नहीं आती और रास्ता, वह तो ढूंढना भी मुश्किल हो जाता है।
     ‌‌‌‌     रास्ता था ही ऐसा की चलते-चलते साँस फूलने लगता है। पहाड़ के रास्ते पर तो मजबूत पांव का आदमी ही चल सकता है। क्राॅस वाला पहाड़ तो नजदीक था लेकिन थकान भी भरपूर थी।      

               हम भी एक बार तो उस रास्ते से आगे निकल गये थे। आगे एक धार्मिक संस्थान था। वहाँ से क्राॅस वाली पहाड़ी का रास्ता पूछा तो पता चला की उसके लिए एक छोटा सा रास्ता है जो की पीछे रह गया।
                      उस पहाड़ी पर पहुंचने के लिए एक अनघड़ पगडंडी थी। उस घुमावदार रास्ते से हम उपर पहुंचे। पहाड़ी पर चढने का रास्ता जरा मुश्किल था, पर लंबा न था।
                      उपर पहुंच तो एक अलग ही नजारा था।‌ प्रभु यीशु की एक विशाल मूर्ति वहाँ स्थित थी। सफेद पत्थर से निर्मित, प्रभु यीशु सलीब पर लटके हुए। उपर पहुंचे तब तक थक गये थे।‌ उस पहाड़ी पर एकमात्र प्रभु यीशु की उस विशाल मूर्ति के  अतिरिक्त और कुछ नहीं था। मूर्ति की छाया में हमने विश्राम किया। वहाँ शांति थी, शीतल हवा थी।
            वहाँ पर घास खूबसूरत थी। घास सूख चुकी थी लेकिन उसका सौन्दर्य यथावत था। अगर वह घास  हरी होती तो नयन कभी भी तृप्त न होते। 

  हुकम जी ने तो दिल लूटा दिया घास पर। हुकम जी का विशेष शौक फोटोग्राफी है। उस घास पर जो एक बार लेट फिर तो विभिन्न एंगल से फोटोशूट होता रहा।

    ‌‌मनोज सर को घूमता का शौक है लेकिन फोटो का नहीं इसलिए वे पहाड़ी पर बैठ एक साधक की तरह शहर को निहारते रहे।


                       यहाँ से पूरा माउंट आबू शहर नजर आता था। कुछ समय हम तीनों मित्रों ने वहाँ फोटोग्राफी की। एक फोटो के  दौरान, उछलते हुए घुटने में दर्द हो गया। दर्द के कारण काफी परेशानी हुयी। हालांकि वह फोटो बहुत अच्छी आयी थी।

                       पहाड़ी पर उस मूर्ति के अतिरिक्त और कुछ न था। थकान और प्यास से परेशान थे। फोटोग्राफी और विश्राम के पश्चात हमने वहाँ से वापसी की।
                       लगभग तीन घण्टे की यह यात्रा रोचक और यादगार रही।

Jaipur


सोमवार, 31 दिसंबर 2018

वतन

राजस्थान विधान सभा चुनाव-2018

शिक्षक जीवन में प्रवेश के बाद नये-नये अनुभव भी प्राप्त हो रहें हैं। कुछ नया करने को, कुछ नया सीखने को मिल रहा है। जीवन का आनंद भी सीखने में है।  
             लोकतंत्र का एक बड़ा पर्व है मतदान। मतदान  जनता और देश का भविष्य तय करता है।  मतदान के दिन जनता निर्णय लेती है और यह निर्णय उसने भविष्य का निर्माण करता है।
             आज तक तो मैंने लाइन में लग कर मतदान किया था और आज प्रथम बार मुझे मतदान करवाने का सौभाग्य मिला।  जिसमें कुछ नया अनुभव प्राप्त किया।
             राजस्थान विधान सभा आम चुनाव-2018 का

      07.12.2018 को राजस्थान विधान सभा के आम चुनाव हैं। हमें दिनांक 06.12.2018 को जिला‌ मुख्यालय सिरोही पहुंचना था।  माउंट आबू और सिरोही की दूरी लगभग 85 KM है लेकिन समस्या यह है की सर्दी की सुबह आठ बजे सिरोही पहुंचना था और इतनी सुबह साधन की व्यवस्था होना मुश्किल है।  हमें आठ अध्यापन मित्र थे। माउंट स्कूल से छोटे लाल जी, दयानंद जी, श्याम सुंदर जी, हुकुम चंद और मैं गुरप्रीत सिंह। ओरिया स्कूल से सुरेश कुमार, मनोज कुमार (दोनों मेरे रुममेट) और राजु आलिका जी।
         सुबह 6:30 बजे एक तय जीप द्वारा तय समय  आठ बजे निर्धारित स्थल  'नवीन भवन सिरोही' पहुंचे।
                  तीसरे चरण की आज ट्रेनिंग थी। इससे पूर्व  नवंबर माह  में दिनांक बारह और छब्बीस को दो  ट्रेनिंग हो चुकी थी। इस तीसरी ट्रेनिंग में मुझे मेरे वो चुनाव साथी मिल गये जिनके साथ मुझे बूथ पर कार्य करना था।  चारों तरफ टेंट की व्यवस्था और अंदर व्यवस्थित बैठक।   एक बात यहाँ उल्लेखनीय अगर हम चाहें तो एक अच्छी व्यवस्था स्थापित कर सकते हैं‌ जैसा मैंने इन तीन ट्रेनिंगों में देखा। सब कुछ व्यवस्थित था। आपको आपकी‌ निर्धारित लाईन में, निर्धारित सीट पर ही बैठना है।
                   यहाँ पर आकर हमारे अध्यापन साथी अलग-अलग हो गये और तय प्रणाली के अनुसार नये साथी मिले। वह टीम मिली जो चुनाव में साथ होगी।

मेरे चुनाव के साथी

                    चुनाव के साथी इस प्रकार थे।
               PRO- अचला राम मेघवाल,
               PO-2 मुकेश पुरोहित,
               PO-3 गजेन्द्र जी और PO-1 मैं था।
                ट्रेनिग के पश्चात हमने अपनी मशीनें (AVM, CU, VVPAT) और विभिन्न प्रपत्र एकत्र किये।
                   हमारा विधानसभा क्षेत्र था रेवदर (148) और बूथ था गाँव मीठन(दाया भाग)(क्रमांक-137) हमारी पार्टी का नंबर था-571. 
                   अब हमारी पहचान इन नंबरों से थी अब हमारे नाम PRO, PO-1,2,3.
                     मीठन गांव के लिए दो टीमें थी। हमारी टीम 137 नंबर और दूसरी टीम‌ नंबर 138.

                     एक निर्धारित बस से हमारा सफर आरम्भ हुआ।   लगभग पचास किमी. का सफर हमें तय करना था। इस सफर का एक तय मार्ग था, उस मार्ग के अतिरिक्त किसी भी मार्ग से हमें नहीं जाना था। इस निर्धारित मार्ग में 06 'चुनाव चैक पोस्ट' बने थे, जहाँ पर पहुंच कर हमें अपने आगमन की सूचना देनी थी। क्या जबरदस्त व्यवस्था थी। लगभग 50-60 KM. की दूरी में हमारी बस 06 जगह ट्रेक की की गयी और तुरंत सिरोही यह सूचना भी पहुंचायी गयी की निर्धारित बस निर्धारित मार्ग से अपने गंतव्य को बढ रही है।
                           जब हमने ये 06 चैक पोस्ट पार कर लिये तो अब हमें एक रजिस्टर मोबाइल नंबर से एक तय फाॅर्मेट में अपनी समय-समय पर मैसेज द्वारा सूचना देनी थी। यह मैसेज सूचना निर्धारित बूथ पर पहुंचने से लेकर आगामी दिवस को मतदान पेटी जमा करवाने के दौरान तक देनी थी‌ की हम सुरक्षित वापस पहुंच गये।
                             इसे कहते हैं व्यवस्था। हर पल, पल-पल की रिपोर्ट।
                             मीठन गांव(रेवदर, विधानसभा) में पहुंच कर हमने सबसे पहले अपना बूथ वाला कमरा देखा। उसमें किसी भी प्रकार का कोई चित्र, ‌पोस्टर या चिह्न नहीं होना चाहिए।
                             चुनाव के दौरान इतने प्रकार के प्रपत्र, लिफाफे, अन्य सामग्री दी जाती है की दिमाग समझ ही बह पाता की क्या करना है। किस प्रपत्र को किस प्रकार भरना है। साथी मित्रों को फोन करो या यू टयूब का सहारा लो, तब जाकर काम समझ में आता है। फिर भी बहुत से प्रपत्र अधूरे रह जाते हैं या फिर अनावश्यक समझ कर छोड़ने पड़ते हैं।
                             देर रात तक हमने विभिन्न कागजात तैयार किये ताकी चुनाव के समय कोई परेशानी न हो। देर रात तक कार्य करके सो गये।
                             सुबह चार बजे आँख खुल गयी। आँख तो क्या खुली, सच तो यह किसी को भी ढंग से नींद नहीं आयी। हालांकि विद्यालय में रात्रि विश्राम की अच्छी व्यवस्था थी। 

 

विद्यालय में बरगद का पेड़।

                             सुबह के चार बजे, चारों तरफ अंधेरा, मौमस बिलकुल ठण्डा,  और नहाने का ठण्डा पानी। बस इस ठण्डे पानी का विचार कहां नहाने देता था। हिम्मत की, सबसे पहले नल के ठण्डे पानी के नीचे सिर देने की हिम्मत मैंने ही की। फिर तो मुकेश जी और गजेन्द्र जी भी आ पहुंचे।
                             अचला राम जी उठ तो गये थे लेकिन फिर भी रजाई से बाहर मुँह नहीं निकाला।  सुबह छ: बजे हमने सब व्यवस्था कर दी थी।  सब मशीने तैयार थी। सात बजे Mock Poll आरम्भ करना था। 7:15 पर दो एजेंट पहुंचे। सभी के लिए  मशीनें प्रदर्शन को तैयार थी। रेवदर विधानसभा से NOTA समेत कुछ आठ प्रत्याशी थे।

                              8:15 पर वास्तविक मतदान आरम्भ हुआ। हमारे पास कुल 585 मतदाता ही थे। सुबह एक बार तो एक- दो व्यक्ति बोले की मतदान जल्दी आरम्भ करो, हमें काम है। लेकिन चुनाव आरम्भ होने के बाद सब शांति रही। क्योंकि ज्यादा वोटर थे नहीं थे। कभी-कभी तो हम दस-बीस मिनट खाली बैठे रहते थे  और कभी -कभी  मतदाता एक साथ समूह में ही आते थे।

एक बार एक समस्या भी आयी। एक लड़का किसी का फर्जी मतदान करके चला गया। जो भी वोट देने आता है तो वह सबसे पहले PO-01, के पास आता है। PO-01 उसके पास उपलब्ध दस्तावेज (वोटर स्लिप, आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड आदि) के आधार उसकी पहचान  करनी है और उसका नाम पुकारता है। पीछे बैठे एजेंट उसकी पहचान सुनिश्चित करनी होती हैं। एजेंट का काम भी यही होता है की वह सही-गलत मतदाता की पहचान करे।
         जब वह लड़का वहां पहुंचा तो मैंने वोटर स्लिप के आधार पर उसका नाम पुकारा तो पीछे बैठे दोनों एजेंट ने कोई आपत्ति नहीं। उसके लगभग एक घण्टे बाद असली मतदाता वहाँ आ पहुंचा, उसके साथ एक व्यक्ति और भी था। आते ही दोनों ने शोर मचा दिया, हमारा वोट किसी ने पहले ही पोल कर दिया।
         हमारे बूथ पर मीठन गाँव के अलावा आस पास के छोटे छोटे एक दो गाँव और कुछ ढाणियों के लोग भी जुड़े हुये थे, इसलिए उनकी पहचान करना मुश्किल था।
         मैंने उसका क्रमांक देखा तो मेरा माथा ठनका। यह मेरी जिम्मेदारी थी, और एजेंट को तय करना था कौन गलत था कौन सही।
            तभी काँग्रेस पार्टी का एजेंट बोला -"सर, यह लड़का सही है। पहले जो लड़का इसकी जगह वोट डाल कर गया है, वह गलत था।"
            "भाई, तुझे पहले बोलना चाहिए था?"
            "मैंने कहा था।"
            "किसे?"
            "मैंने सुशील को कहा था।"- उसने भाजपा के एजेंट की ओर इशारा किया।
            " भाई, आप मुझे बताते। आपको सुबह भी यही निर्देश दिये गये थे की आपको कहीं भी कोई आपत्ति हो तो तुरंत बोले।"
            दोनों खामोश।
PRO अचला राम जी ने सब स्थिति को संभाल लिया। उस लड़के का 'टेंडर वोट' डलवाया गया।
टेंडर वोट- ऐसी परिस्थिति में टेंडर वोट डलवाया जाता है, जो की EVM मशीन की बजाय बैलेट पेपर द्वारा पोल करवाया जाता है।
         यह हमारी प्रथम गलती थी। लेकिन कुछ समय पश्चात एक ओर महिला आ गयी। उसका नाम तो अब याद नहीं। मैंने उसका क्रमांक देखा तो उस क्रमांक पर पहले ही वोट डाला जा चुका था।
         "हे! भगवान।"- मैं घबरा गया, लेकिन इस समस्या का समाधान तुरंत हो गया क्योंकि वह हमारे बूथ की मतदाता नहीं थी। यह संयोग था की उसका नाम समान था।
          ऐसा ही एक और किस्सा है जब एक लड़की वोट डालने आयी। वह मुश्किल से पन्द्रह- सोलह साल की होगी। मैंने उसकी वोटर स्लिप देखी, आधार कार्ड देखा, उसका चेहरा दोनों जगह समान था। शक्ल मिल रही थी। तभी पीछे से कांग्रेस के एजेंट ने विरोध जता दिया।
          "यह लड़की तो और है।" - वह चिल्लाया।
          "कैसे?"-मैंने पूछा- " इसकी शक्ल तो दोनों पहचान पत्रों में मिल रही है।"
          "वोट इसकी बड़ी बहन का है और ये उसकी छोटी बहन है। बस शक्ल दोनों की मिलती है।"
          "क्यों बेटा फर्जी वोट डालने आयी हो।"- मैंने उसे समझाने के अंदाज में कहा,- " पता है यह कानूनन अपराध है।"
          वह बच्ची घबरा गयी और वापस भाग गयी।
हमारे साथ एक पुलिस काॅनिस्टेबल भी था। हनुमानगढ़ के रावतसर  से कोई पवन कुमार नाम से। लेकिन डयूटी बूथ के गेट पर थी, पर वह अपनी डयूटी से लापरवाह रहा। अगर वह अपनी डयूटी पर बैठता तो अचानक से आने वाली भीड़ या जो लोग हमारे मेज पर एकत्र हो जाते थे उनसे बचाव हो जाता। हमारे कोई गंभीर समस्या न थी इसलिए PRO ने भी उसे कुछ नहीं कहा।    
            मुझे यहाँ के लोगों के नाम बहुत अजीब से लगे। पंखू देवी(यह यहाँ की महिलाओं का सर्वाधिक नाम था), डाया राम, गोधा राम, ....लड़कों मे अर्जुन नाम बहुत था।
                            शाम को पांच चुनाव समापन का समय था। हमने निर्धारित घोषणा के बाद विद्यालय का मुख्य दरवाजा बंद करवा दिया।  हमे इतनी परेशानी चुवान के दौरान नहीं आयी जित‌नी अब, इतने प्रपत्र और इतने लिफाफे थे पता ही नहीं चला रहा था की कौनसा प्रपत्र भरना है और कौनसा नहीं। किस प्रपत्र को किस लिफाफे में डालना है और किसे नहीं। सबसे बड़ी समस्या यह की सब प्रपत्र अंग्रेजी में। पता नहीं क्यों हम अंग्रेजी के इतने अधीन हैं। आज 70 साल बाद भी अंग्रेजी का मोह नहीं छूटा और ढंग से सीखा/सीख भी नहीं पाये।
                            एक किस्सा तो रोचक था। अंग्रेजी में एक लाइन समझ में नहीं आ रही थी।
                            "गुरप्रीत जी, इसका अर्थ क्या है। इसमें क्या भरना है।"- अचलाराम जी ने पूछा।
                            मेरी समझ में भी कुछ नहीं आया। तब PO-2 मुकेश जी ने 'गूगल ट्रास्लेट' का सहारा दिया। गूगल ट्रास्लेट ने तो नजारा ही बदल दिया। गूगल का उत्तर था " काम में लिए गये बर्तनों की सख्या।"
                            'यह तो बर्तनों की सख्या बता रहा है, जो हमने काम में लिए थे।"-मुकेश जी ने कहा।
                            "आप भी मजे ले रहे हो। इनमें बर्तनों का कहां संबंध है।"-मैंने कहा।
                            " तो फिर चुनाव केडिडेट के निशान की बात होगी?"
                            "भाई उनमें कहां बर्तन होते हैं। भाजपा का कमल क्या बर्तन होगा। हाथी और हाथ कहां बर्तन होंगे।"
                            "यार, गूगल तो यही बता रहा है।"
                            "मैं दूसरी पार्टी से पूछ कर आता हूँ।"- अचलाराम जी बाहर को भागे।
                            पांच बजे वोटिंग खत्म हुयी लेकिन हम आठ बजे तक लगे रहे। सभी कागजों को समझना और भरना। कुछ गलत नहीं भरना और अतिमहत्वपूर्ण कागजों को खाली नहीं छोड़ना।‌ जिन लिफाफों में कोई सूचना नहीं है उनमें एक रिक्त सफेद  कागज पर NILL लिखकर डालना था। उन लिफाफों को भी निर्धारित पैकेट में बंद करना था।
                            दोनों पार्टियां 8:10 PM पर मीठन गांव से रवाना हुयी। वापसी पर भी वही चैक पोस्ट की प्रक्रिया से गुजरते हुए। रात को लगभग नौ बजे‌ 'नवीन भवन सिरोही' पहुंचे।
                          

रात्रि के कुछ दृश्य

  यह रात का मेला दर्शनीय था। चारों तरफ मतदान कर्मचारी अपनी मशीनों के साथ घूम रहे थे। खूब भीड़ थी। कुछ ऐसे भी थे जो बूथ से सील आदि ‌नहीं‌ लगाकर थे, वे यहाँ बैठे अपनी मशीनों और लिफाफों को सीलिंग कर रहे थे। अगर आपके काम में थोड़ी सी भी कमी रह गयी तो आपकी मशीन जमा नहीं होगी।
                            अचलाराम जी और गजेन्द्र जी EVM, VVPAT आदि मशीने जमा करवाने की लाईन में काउंटर नंबर एक में लगे। मुकेश जी अस्वथ होने के कारण एक तरफ बैठ गये। मैं दो नंबर काउंटर पर लिफाफे जमा करवाने गया। मुझे जहां मात्र आठ-दस मिनट लगे तो वहीं अचलाराम जी को दो घण्टे लाइन में खड़ा रहना पडा़।
                            लगभग रात के  बारह बज गये थे जब हमारा दल सभी कार्यों से निवृत्त होकर अपनी OD (Office Duty) लेकर आया।
                               वहीं मेरे मित्र छोटे लाल जी, दयानंद जी और हुकम‌ जी अपने कार्य से निवृत्त होकर यहाँ से शहर को निकल गये थे। 

मशीन जमा करवाने के दौरान लाइन में श्याम जी।

                                मैं और श्याम जी अपने कार्य से निवृत्त होकर एक कैंटीन पहुंचे वहाँ से खाना खाकर निपटे तो मनोज जी की काॅल आ गयी। रात का लगभग एक बज गया था। मित्र सुरेश जी भी कुछ समय पश्चात आ पहुंचे।

       हम कैम्पस से बाहर आये,पार्किंग में बहुत कम‌ साधन‌ थे। अब घर जाने के लिए कोई व्यवस्था नजर नहीं आ रही थी। पैदल से सड़क पर घूम‌ रहे थे।   कुछ आगे जाने पर ह‌म‌ हमारे कुछ और शिक्षक मित्र भी नजर आये जो किसी साधन के इंतजार में थे।
                अर्धरात्रि को माउंट आबू के लिए वाहन मिलना मुश्किल था। अब जाये तो कहां जाये।  बस सड़क पर चल रहे थे। तभी एक स्कूल‌ बस कैम्पस की तरफ से आयी। वह चुनाव की ही बस थी। उस बस में हमें सीट मिल ही गयी। यह वही बस  थी जिससे हमारी पोलिंग पार्टी गयी थी।
                    रात को 3:30 AM हम‌ घर पहुंचे।
                   
  मेरे जीवन का यह चुनाव यादगार रहेगा।