सोमवार, 13 मार्च 2017

होली- कविता- मंजु

हर वर्ष फागुन में आती होली
हर बार नए रंग लाती होली।
           कभी गुब्बारे कभी गुलाल
           कहीं कोई पिचकारी लाल
          सबको रंग रंग जाती होली।
कभी किसी की चुनरी भीजे
कभी कोई बलमा पर रीझे
सबका मन हर्षाती  होली।
            कोई लेता गुझिये का मज़ा
            किसी पे चढ़ा है भंग का नशा
            क्यूँकि ये है मदमाती होली।
कुछ लोग क्यूँ खेलते खून से होली
नहीं समझते प्यार की बोली
किसी को वैर नहीं सिखाती होली।
          आओ मिलकर प्रण करे
          हर मन में ख़ुशी का रंग भरे
    और खेले प्रेम रंग बरसाती होली।।
   
    -  मंजू इंखिया
              प्राध्यापिका-हिंदी

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

जंगल में प्रजातंत्र - बाल कहानी

जंपी बंदर बहुत दिनों बाद चंपक वन लौटा था। वह बचपन से ही अपने मामा के पास शहर में रहता था। इस बार वह अपनी पढाई पूरी कर के आया था।
      जंपी को पता चला की जंगल में अब भी शेर सिंह का राज चलता है। यहां कभी चुनाव भी नहीं होते। जंपी को अच्छा नहीं लगा। उस ने फैसला किया की इस बार जंगल में चुनाव करवाए जाए।
  उस ने हाथी दादा से कहा, "दादा, इस बार हम जंगल में चुनाव करवाएंगे।"
"पर बेटा, किस की हिम्मत है जो शेर सिंह के सामने चुनाव लङे। वैसे भी जंगल में कभी चुनाव नहीं हुए।" हाथी दादा ने कहा।
  "पर ऐसा क्यों दादा, अब तो हर जगह प्रजातंत्र का जमाना है। कोई भी चुनाव लङ सकता है।" जंपी ने कहा।
   "तुम्हारी बात सही है, बेटा। पर जंगल के जानवर अनपढ हैं, वे भला प्रजातंत्र के बारे में क्या जानते हैं।"- हाथी दादा बोले।
    "मैं सब जानवरों को समझाऊंगा, दादा।"- जंपी ने कहा।
   "मैं तुम्हारे साथ हूं, बेटा।"- हाथी दादा खुश होकर बोले।
              उस के बाद जंपी रोज चंपक वन में घूमता। वह सब को चुनाव के बारे में समझाता। सभी शेर सिंह के जुल्म से परेशान थे। मगर सिंह के डर के कारण बोल नहीं पाते थे।
जंपी की खबरें राजा शेर सिंह के पास भी पहुंचने लगी। शेर सिंह सभी को अपनी तरफ करने लगा। धीरे-धीरे चुनाव का समय नजदीक आने लगा।
    "हम चुनाव में खङा किसे करेंगे?"- मिकी हिरण ने कहा।
"हमें सभा बुलानी होगी। उसी में हम सब की राय से उम्मीदवार का नाम तय होगा।"- जंपी बंदर ने कहा।
               फिर एक दिन जंगल में सभा हुयी। जंपी बंदर ने एक ऊचें पत्थर पर चढकर जानवरों से कहा, "आप सभी को पता है कि अब सब जगह प्रजातंत्र है, पर हमारे चंपक वन में राजा का राज ही चल रहा है। हमें मिलकर प्रजातंत्र लागू करना है, इसलिए हमें आज अपना उम्मीदवार तय करना है। एक ऐसा उम्मीदवार जो हम सभी की परेशानी समझ सके, जंगल का फायदा करे।"
"पर हम अपना उम्मीदवार किसे चुनें? "- पिंकी कोयल ने पूछा।
सब सोचने लगे की उम्मीदवार किसे बनाया जाये। आखिर में सब की राय से हाथी दादा को चुना गया। लंबू जिराफ ने दादा को माला पहनाई। सभी ने हाथी दादा को जिताने का वादा किया।
      जब यह खबर शेर सिंह के पास पहुंची, तो वह आग-बबूला हो उठा। उस ने सभी को हाथी दादा के खिलाफ भङकाना शुरु कर दिया।
       चुनाव का दिन आ गया। जंगल में पहली बार चुनाव हो रहे थे। सभी खुश थे। एक तरफ हाथी दादा थे दूसरी तरफ शेर सिंह। शेर सिंह ने सभी को अपनी तरफ मिलाने की भरसक कोशिश की।
     शाम को चुनाव खत्म हुआ।
     वोटों की गिनती हुयी।
हाथी दादा भारी मतों से जीते। जंगल में खुशी छा गयी। शेर सिंह जंगल से भाग गया। जंगल में प्रजातंत्र की जीत हुयी।
..............
चंपक, जुलाई(द्वितीय) 2005
(मेरी प्रकाशित प्रथम कहानी)

एक चूहा

रविवार का दिन था। बंटी अपने दोस्तों के साथ पार्क में खेल रहा था। तभी उसे मम्मी की आवाज सुनाई दी,
"बंटी, जल्दी यहां आओ।"
वह भागा अाया।
"क्या है?"- उसने मम्मी से पूछा।
मम्मी बोली, -"इस कमरे में एक मोटा सा चूहा है। उसे भगाओ। नहीं तो वह सारा सामान कुतर कर खराब कर देगा।"
"ठीक है, मम्मी। मैं अभी अपने दोस्तों के साथ चूहे को भगाता हूं"- बंटी ने कहा।
मम्मी दूसरे कमरे में गयी। बंटी ने अपने दोस्तों को बुला लिया।
"क्या काम है?"-आते ही सोनू ने पूछा।
बंटी ने सभी को चूहा पकङने की बात बताई।
"चूहा"- दीपा घबरा गयी, "मुझे तो चूहे से बहुत डर लगता है।"
बंटी ने कहा, "डर कैसा, हम अभी चूहे को यहां से भगा देंते हैं।"
सभी दोस्त चूहे को भगाने को तैयार हो गये। चिंटू और दीपा ने झाङू उठा लिया, बंटी ने बैट, चिकी और सोनू ने डण्डे ले लिए।
सभी कमरे में पहुंचे। उन्होंने अंदर से कमरा बंद कर के बल्ब जला लिया।
"कहां है चूहा?।"- चिकी ने इधर-उधर देखा।
"उन थैलों के नीचे होगा,"-सोनू ने कमरे के कोने में रखे थैलों की तरफ इशारा किया,
"मैं अभी देखता हूं।" सोनू और बंटी ने एक-एक कर थैले नीचे उतारे।
आखिरी थैला हिलाते ही चूहा निकल कर भागा।
"वह रहा।"- चिंटू ने जोर से झाङू चूहे पर दे मारा।
चूहा भाग गया। झाङू सामने पङे फूलदान से टकराया। फूलदान टूट गया, पर फूलदान की किसे परवाह थी। चूहा भाग कर कोने में रखी कुर्सी के नीचे जा दुबका। चूहे को वहां देख बंटी ने अपना बैट घूमा कर मारा। बैट चूहे को लगने की बजाय कुर्सी से टकराया। कुर्सी की टांग टूट गयी। चूहा फिर भागा। वह दूसरे कोने में रखी मेज के नीचे जा दुबका।
     बंटी चिल्लाया, -"इस बार बचना नहीं चाहिए।" चिकी ने जोर से अपना डण्डा घुमाकर मारा। डण्डा मेज से टकराया। मेज पर रखा लैंप नीचे गिर कर टूट गया। चूहा मेज के नीचे से निकल कर भागा। चिंटू और दीपा ने झाङूओं से उस पर हमला जर दिया। पर चूहा सही-सलामत पलंग के नीचे जा छिपा।
"अब क्या करें?"- चिक्की चिल्लाया।
सोनू और चिंटू ने पलंग को कमरे के बीच में कर दिया। पलंग हिला तो चूहा दौङ कर कमरे में रखी बङी मेज की टांग से जा लगा।
   "चारों तरफ खङे हो जाओ।"- दीपा ने कहा।
सोनू का डण्डा चला। चूहे की जगह डंडा मेज से टकराया। चूहा फिर निकल भागा। चूहे के भागते ही सब ने एक साथ उस पर हमला कर दिया। चूहा तो भाग निकला, पर दीपा का झाङू चिंटू के सिर में लगा। वह मेज से टकराया, तो मेज पर रखी घङी नीचे गिर कर टूट गयी। चूहा ऐसा भागा की किसी को दिखाई नहीं दिया।
"चूहा किधर गया?"- चिंटू ने संभलते ही पूछा।
पर चूहा ऐसा गायब हुआ की किसी को दिखाई न दिया। बंटी समेत सभी ने कमरे का सामान उलट-पुलट कर डाला। पूरा कमरा कबाङखाना सा लगने लगा, पर चूहा कहीं न दिखा।
  एकाएक चिकी ने कहा, -"वह रहा चूहा।"
  "कहाँ है?"- सब ने एक साथ पूछा।
"उस बैग में।"- चिकी ने कमरे के दरवाजे के पास पङे बंटी के बस्ते की तरफ इशारा किया।
  वहां चूहे की पूंछ दिखाई दे रही थी।
    "शी....चुप रहो"- बंटी ने कहा, "इसे आराम से पकङेंगे।"
    सभी दोस्त धीरे से बस्ते की तरफ बढे बंटी ने दबे पांव जाकर पीछे से चूहे की पूंछ पकङ ली उस ने चूहे को हवा में लहराया। अचानक चूहा उछला। बंटी के हाथ से निकल कर वह सीधा दीपा के मुँह से जा टकराया।
     "आ......।" चूहे के टकराते ही दीपा चीखी।
चीख सुनकर बंटी की मम्मी भागी आयी।
  "क्या हुआ?"-मम्मी बोली, "जल्दी दरवाजा खोलो।"
बंटी ने दरवाजा खोला। मम्मी अंदर आ गयी। मम्मी ने कमरे की हालत देखी, तो वह खङी रह गयी। पूरे कमरे का सामान बिखरा पङा था।
"यह क्या है?"- मम्मी ने जोर से पूछा।
"वह गया।"- सोनू चूहे को कमरे से बाहर भागते देख कर बोला।
सारे बच्चे एक साथ बाहर चूहे के पीछे भागे। मम्मी कमरे का सामान देखती रह गयी।
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   चंपक, अगस्त(द्वितीय) 2006

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

दीवारेँ







निरंतर उठती
बनती, बढती दीवारेँ
देती हैँ सुरक्षा
प्राकृतिक-अप्राकृतिक विपत्ति से
तब अच्छी लगती हैँ दीवारेँ।

धीरे-धीरे ह्रदय मेँ पनपती
ईर्ष्या, द्वेष की दीवारेँ
बाँटती मानवता को
धर्म, जाति और राजनीति की दीवारेँ
यूँ पलती-बढती
अच्छी नहीँ लगती दीवारेँ।

टूटती, फूटती, गिरती
कच्ची-पक्की दीवारेँ।
पर मुश्किल हो जाती है
गिरानी दिलोँ की दीवारेँ।।
 
 -अभिनव प्रयास(अक्टु.-दिस.-2012)अलीगढ, उत्तर प्रदेश से प्रकाशित।

जीवन



जीवन है सुख दुख का दरिया
लहरं जिसमें आती जाती,
नांव  किनारे वही है लगती
जो लहरों से है टकराती।


फूल सा है यह जीवन
खिलता और मुरझाता,
सार्थक करता वही जीवन को
जो सुकर्म सुगंध है बिखराता।


प्रेम पवित्र से ही जीवन
मधुमय बन जाता है,
सत्य,अहिंसा और धर्म से
जीवन श्रृंगारित हो जाता है।
  
जीवन का अनवरत क्रम
  
हार-जीत और खोना-पाना,
परहित उत्सर्ग है मानवता
सुख-दुख में सबका साथ निभाना।


जीवन के महासमर में
संघर्ष हि पार लगाता है,
परिश्रम और धैर्य से
मानव विजयी बन जाता है।।

   

याद



जब-जब मैँ उदास होता हूँ,
तब-तब याद आते हैँ,
वो हसीन पल
जो तुम्हारे साथ बीते थे।
आँखोँ मेँ तैर जाती है
तुम्हारी हवा सी चंचल छवि।

तब बरबस होठोँ पर
थिरक उठती है स्निग्ध मुस्कान
उठ जाते हैँ दुख के बादल।

तुम पास नहीँ हो
पर तुम्हारी याद
सीने से लगी रहती है
जो हर दुख मेँ देती है
एक मधुर सांत्वना।।

अविराम साहित्यिकी(दिस.-2011) हरिद्वार, उत्तराखण्ड से प्रकाशित।

विश्वास




 वृद्व पुजारी की आंखें सहसा खुल गई।उन्हें लगा मन्दिर में कहीं कोइ है। रात्रि का अन्तिम पहर। ‘कोई है या भ्रम है’’ पुजारी निर्णय न कर पाया।मोमबती जलाई, रोशनी में पुजारी के चेहरे पर अनुभव की रेखाएं चमक उठी।
 मोमबती लिए वे मन्दिर के उस कक्ष की तरफ बढ़ चले,जहा भगवान की मूर्ति स्थापित थी। पुजारी ने धीरे से कक्ष का दरवाजा खोला, मोमबती के प्रकाश से कक्ष प्रकाशित हो उठा। पुजारी ने देखा, एक क्षीणकाय व्यक्ति दान पेटी खोलने का प्रयास कर रहा है,उसी की रह रह कर ध्वनि उठ रही है।
 भगवान की मूर्ति के चेहरे पर स्निग्ध मुस्कान विराजित है। क्षीणकाय व्यक्ति रोशनी से भयभीत हो कर पीछे की तरफ मुड़ा तो दरवाजे पर वृद्व पुजारी शांत मुंद्रा में खड़े थे।

 वह व्यक्ति पुजारी के चरणों में गिर पड़ा,-‘‘मुझे क्षमा करे’’

 पुजारी ने कहा,-‘‘क्षमा तो उस भगवान से मांगो, जो सर्वदाता है।’’
 ‘‘मेरे साथ आओ।’’-पुजारी ने कहा और वापस चल पड़े। 
 वह व्यक्ति थके से कदमों से पुजारी के पीछे उनके कक्ष में पहुंचा।
 वृद्व पुजारी ने उस व्यक्ति को रूपये देते हुए कहा,-‘‘ये रूपये लो।इस कक्ष में जो वस्तु तुम्हे चाहिए ले जा सकते हो।’’
 उस व्यक्ति ने विस्मय से कहा,-‘‘रूपये तो में वहीं से भी निकाल रहा था।’’
 पुजारी ने उतर दिया,-‘‘वह सम्पति जनता की थी,यह मेरी निजी सम्पति है।अगर वहॉं चोरी हो जाती तो जनता का भगवान से विश्वास खत्म हो जाता।ईश्वर लोगों का अन्तिम विश्वास है।’’
 क्षीणकाय व्यक्ति पश्चाताप की मुद्रा में बोला,-‘‘पुजारी जी,मुझे क्षमा करें।मैं अपनी स्वार्थ पूर्ति हेतु न जाने कितने लोगों का विश्वास तोड़ रहा था और एक आप है जो लोगों का विश्वास रखने के लिए अपना सब कुछ दे रहे हो। आप धन्य हैं,जिन्होने मुझे नया रास्ता दिखाया।’’
 वह व्यक्ति अपने अश्रु पोंछता हुआ बाहर निकल गया।पूर्व से सुर्य की लालिमा धीरे-धीरे फैलने लगी।