मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

गाँधी और भगत सिँह


निशीथकाल। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और भगत सिँह पर चिँतन करते-करते गाँधी जी निँद्रालीन हो गये। चीँटी मात्र मेँ ईश्वर दर्शनकरने वाले गाँधी जी का ह्रदय भगत सिँह की फाँसी की बात सुनकर विचलित हो उठा था।  
निस्तब्ध रात्रि,  सर्वत्र अँधेरा व्याप्त था।
गाँधी जी चौँककर उठ बैठे। सामने भगत सिँह खङा मुस्कुरा रहा था।
"बापू, चिँताग्रस्त दिखाई दे रहे हो।"
"पुत्र फाँसी के फँदे पर हो तो बाप को चिँता तो होगी ही।"-थका सा स्वर था गाँधी जी का।
भगत सिँह ने हँसते हुए कहा-"बापू यह तो खुशी का समय है। मुझे देशभक्ति का सर्वोतम पुरस्कार मिलने जा रहा है।"
"पुत्र, तुम जैसे नौजवान ही तो निराश भारतीयोँ को रोशनी दिखा सकते हैँ।"
"रोशनी करने के लिए तो स्वयं को जलना ही पङेगा।"
पलभर को मौन छा गया।
"बापू, मुझे एक वचन दो।"-भगत सिँह ने गम्भीर स्वर मेँ कहा।
"बोलो पुत्र।"
"आप मेरे लिए अंग्रेज सरकार से रिहाई की अपील ना करना।"
"क्या ?"-गाँधी जी का आश्चर्युक्त स्वर।
"मैँ क्षमा प्राप्त कर कायरोँ मेँ स्थान प्राप्त नहीँ करना चाहता।"-भगत सिँह ने दृढता से कहा।
"भगत, आज देश को तुम्हारी जरूरत है।"-गाँधी जी कहा।
"आज एक भगत सिँह खत्म होगा तो कल सैकङोँ भगत सिँह पैदा होंगे। इस नई क्राँतिकारी फसल की जिम्मेदारी आपकी है बापू, मैँ तो क्राँति का बीज बो चला।"
 वृद्ध आँखेँ आँसुओँ से नम हो गई।
"बापू, आशीर्वाद दो।"
भगत सिँह आशीर्वाद लेने को झुका तो गाँधी जी ने आगे बढकर भगत सिँह को ह्रदय से लगा लिया। खाली बाँहेँ आपस मेँ टकराई। गाँधी जी की नीँद टूट गई। गाँधी जी उठकर बैठ गये। आँखे अभी तक नम थी, ह्रदय विचलित हो उठा। गाँधी जी देर तक शून्य मेँ निहारते रहे।



-लघुकथा वर्तिका (लघुकथा संग्रह) दिसंबर-2013
प्रकाशक-विश्व हिँदी साहित्य परिषद, दिल्ली।

संस्कार


उन्होनेँ मुस्कुराते हुए घर मेँ प्रवेश किया और अपनी पत्नी से बोले-"ये लो रुपये।" "आज सुबह-सुबह इतने रुपये?"-पत्नी ने आश्चर्य से पूछा। उन्होँने हँसते हुए उत्तर दिया,-"तुम जिसे बुरा कहती हो, यह उसी सट्टे की कमाई है। मुन्ना भी कितने दिनोँ से स्कूल फीस के लिए कह रहा था, उसे भी फीस हेतु रुपये दे देना।" 
"मुझे नहीँ चाहिए ऐसी कमाई।"-कहती हुई श्रीमती जी अंदर चली गई-"ऐसे रुपयोँ से बच्चा अच्छे संस्कार नहीँ ले पाएगा।"

"अरे! पैसा तो पैसा है, क्या अच्छा क्या बुरा।"
दूसरे दिन शाम को घर मेँ घुसते ही देखा श्रीमती जी गुस्से मेँ खङी है एवं पास ही मुन्ना सहमा सा खङा है। 
श्रीमती जी से पूछा-"क्या बात है ?"

श्रीमती जी ने उत्तर दिया-"स्कूल से फोन आया था कि कल तक मुन्ने की फीस जमा नहीँ करवाई तो स्कूल से नाम काट दिया जाएगा।"
"पर इसे तो फीस के रूपये कल ही दिये थे", -वे आश्चर्य से बोले और मुन्ने से पूछने लगे-"मुन्ना कहाँ है वो रुपये।"
बच्चे ने रोते हुए उत्तर दिया-"वो कल मैने सट्टा लगा दिया, सोचा आपकी तरहं मुझे भी बहुत सारे रूपये मिल जाऐंगे।"

"क्या ?"-मुहँ खुला रह गया, गलती स्वयं की थी, और वे मन हि मन सोचने लगे-"बच्चा जैसे संस्कार सिखेगा, वह तो वैसा हि बनेगा।।"

-दृष्टिकोण (अंक 13-14)
लघुकथा अंक 2014
कोटा, राजस्थान।