सोमवार, 13 मार्च 2017

होली- कविता- मंजु

हर वर्ष फागुन में आती होली
हर बार नए रंग लाती होली।
           कभी गुब्बारे कभी गुलाल
           कहीं कोई पिचकारी लाल
          सबको रंग रंग जाती होली।
कभी किसी की चुनरी भीजे
कभी कोई बलमा पर रीझे
सबका मन हर्षाती  होली।
            कोई लेता गुझिये का मज़ा
            किसी पे चढ़ा है भंग का नशा
            क्यूँकि ये है मदमाती होली।
कुछ लोग क्यूँ खेलते खून से होली
नहीं समझते प्यार की बोली
किसी को वैर नहीं सिखाती होली।
          आओ मिलकर प्रण करे
          हर मन में ख़ुशी का रंग भरे
    और खेले प्रेम रंग बरसाती होली।।
   
    -  मंजू इंखिया
              प्राध्यापिका-हिंदी

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज मंगलवार (13-03-2017) को

"मचा है चारों ओर धमाल" (चर्चा अंक-2605)

पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' ने कहा…

बहुत सुन्दर होली गीत