शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

जंगल में प्रजातंत्र - बाल कहानी

जंपी बंदर बहुत दिनों बाद चंपक वन लौटा था। वह बचपन से ही अपने मामा के पास शहर में रहता था। इस बार वह अपनी पढाई पूरी कर के आया था।
      जंपी को पता चला की जंगल में अब भी शेर सिंह का राज चलता है। यहां कभी चुनाव भी नहीं होते। जंपी को अच्छा नहीं लगा। उस ने फैसला किया की इस बार जंगल में चुनाव करवाए जाए।
  उस ने हाथी दादा से कहा, "दादा, इस बार हम जंगल में चुनाव करवाएंगे।"
"पर बेटा, किस की हिम्मत है जो शेर सिंह के सामने चुनाव लङे। वैसे भी जंगल में कभी चुनाव नहीं हुए।" हाथी दादा ने कहा।
  "पर ऐसा क्यों दादा, अब तो हर जगह प्रजातंत्र का जमाना है। कोई भी चुनाव लङ सकता है।" जंपी ने कहा।
   "तुम्हारी बात सही है, बेटा। पर जंगल के जानवर अनपढ हैं, वे भला प्रजातंत्र के बारे में क्या जानते हैं।"- हाथी दादा बोले।
    "मैं सब जानवरों को समझाऊंगा, दादा।"- जंपी ने कहा।
   "मैं तुम्हारे साथ हूं, बेटा।"- हाथी दादा खुश होकर बोले।
              उस के बाद जंपी रोज चंपक वन में घूमता। वह सब को चुनाव के बारे में समझाता। सभी शेर सिंह के जुल्म से परेशान थे। मगर सिंह के डर के कारण बोल नहीं पाते थे।
जंपी की खबरें राजा शेर सिंह के पास भी पहुंचने लगी। शेर सिंह सभी को अपनी तरफ करने लगा। धीरे-धीरे चुनाव का समय नजदीक आने लगा।
    "हम चुनाव में खङा किसे करेंगे?"- मिकी हिरण ने कहा।
"हमें सभा बुलानी होगी। उसी में हम सब की राय से उम्मीदवार का नाम तय होगा।"- जंपी बंदर ने कहा।
               फिर एक दिन जंगल में सभा हुयी। जंपी बंदर ने एक ऊचें पत्थर पर चढकर जानवरों से कहा, "आप सभी को पता है कि अब सब जगह प्रजातंत्र है, पर हमारे चंपक वन में राजा का राज ही चल रहा है। हमें मिलकर प्रजातंत्र लागू करना है, इसलिए हमें आज अपना उम्मीदवार तय करना है। एक ऐसा उम्मीदवार जो हम सभी की परेशानी समझ सके, जंगल का फायदा करे।"
"पर हम अपना उम्मीदवार किसे चुनें? "- पिंकी कोयल ने पूछा।
सब सोचने लगे की उम्मीदवार किसे बनाया जाये। आखिर में सब की राय से हाथी दादा को चुना गया। लंबू जिराफ ने दादा को माला पहनाई। सभी ने हाथी दादा को जिताने का वादा किया।
      जब यह खबर शेर सिंह के पास पहुंची, तो वह आग-बबूला हो उठा। उस ने सभी को हाथी दादा के खिलाफ भङकाना शुरु कर दिया।
       चुनाव का दिन आ गया। जंगल में पहली बार चुनाव हो रहे थे। सभी खुश थे। एक तरफ हाथी दादा थे दूसरी तरफ शेर सिंह। शेर सिंह ने सभी को अपनी तरफ मिलाने की भरसक कोशिश की।
     शाम को चुनाव खत्म हुआ।
     वोटों की गिनती हुयी।
हाथी दादा भारी मतों से जीते। जंगल में खुशी छा गयी। शेर सिंह जंगल से भाग गया। जंगल में प्रजातंत्र की जीत हुयी।
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चंपक, जुलाई(द्वितीय) 2005
(मेरी प्रकाशित प्रथम कहानी)

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (01-01-2017) को "नूतन वर्ष का अभिनन्दन" (चर्चा अंक-2574) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
नववर्ष 2017 की हार्दिक शुभकामनाओंं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

jai verma ने कहा…

Achchhi kahani h