शनिवार, 2 मार्च 2013

तुलसी और कैक्टस

                              तुलसी और कैक्टस 

नन्हा बच्चा ना जाने कहाँ से तुलसी का पौधा ले आया और उसे घर मेँ रखे खाली गमले मेँ लगाने लगा। "मुन्ना, क्या कर रहे हो ?।" "मम्मी, तुलसी का पौधा लगा रहा हूँ।"मम्मी चिल्लाई- "कहाँ से उठा लाया, क्या जरूरत थी इसकी।" "मम्मी, दादी माँ कहती थी तुलसी घर मेँ लगाने से घर पवित्र होता है।" "सब बकवास। इससे घर की डेकोरेशन खराब हो जाएगी।"बच्चे ने पुन: प्रतिवाद किया-"मम्मी, गुरुजी कहते थे, तुलसी पर्यावरण शुद्ध करती है।"बच्चे के तर्क-वितर्क से मम्मी खीझ गई। तुलसी के पौधे को घर मेँ आश्रय न मिला। बच्चा उदास हो गया।एक दिन मम्मी एक कैक्टस का पौधा ले आई। "मम्मी-मम्मी यह क्या है ?" बच्चे ने प्रश्न किया। "बेटा, यह कैक्टस है। इससे घर की सुंदरता बढती है।" "मम्मी, इसके फूल कैसे लगते हैँ ?" "मम्मी, इसकी खुशबु कैसी होगी ?"बच्चे ने प्रश्न किये, पर उत्तर गायब।पलभर मौन रह कर बच्चे ने कैक्टस को छूना चाहा तो उसके दोनोँ हाथ काँटोँ से भर गये। बच्चा रोने लगा। "मम्मी यह पौधा गंदा है। इसे घर मेँ मत लगाना।" सुबकते हुए बोला। "बेटा, आजकल लोग इसे ही घरोँ मेँ लगाते हैँ।" मम्मी ने समझाया- "और इसे कभी छूना मत।"बच्चा पौधे का महत्व न समझ सका। अपने हाथोँ को देखता रहा।कैक्टस का पौधा तुलसी के लिए तैयार गमले मेँ आश्रय पा गया।
 -पश्चिम बंगाल नई दिशा (नवं.2012) सलुवा, मे प्रकाशित।

1 टिप्पणी:

MANU PRAKASH TYAGI ने कहा…

बहुत बढिया , ऐसे संस्मरण और लेख जीवन में सीख का काम करते हैं