मंगलवार, 29 जनवरी 2013

अनुत्तरित प्रश्न

   अनुत्तरित प्रश्न
 रविवार की सुबह रामचन्द्र परेशान सा चारपाई पर बैठा समाचार पत्र पढ रहा था। तभी प्रतिष्ठित दल के उम्मीदवार ने अपने कार्यकर्ताओँ के साथ प्रवेश किया।
   "नमस्ते जी।" सभी ने समवेत स्वर मेँ कहा।
   "नमस्ते।" रामचन्द्र ने खङे होते हुए कहा- "बैठिये।"
स्वयं वह एक तरफ खङा हो गया।
   "चाचा अपनी पार्टी का ध्यान रखना।"- स्थानीय नेताजी ने कहा-"इस बार अपनी ही सरकार बननी चाहिए।"
   "बेटा पानी लेकर आना।"- रामचन्द्र ने अपने पुत्र को कहा।
   "भाई जी"-एक कार्यकर्ता ने कहा,-"इस बार प्रगति की लहर दौङेगी।"
स्वयं उम्मीदवार चुप ही रहा, कार्यकर्ता बोलते रहे।  
 "बेटा इधर आ।"- रामचन्द्र ने अपने दूसरे पुत्र को बुलाया।
   "नेता जी को यह अखबार पढ कर सुना।
पुत्र किँकर्तव्यविमूढ खङा रहा।
   "कोई खास समाचार है क्या ?"- एक कार्यकर्ता बोला।
   "जी नहीँ"- रामचन्द्र ने रोष से कहा,- "सरकारी स्कूल मेँ पांचवी मेँ पढता है पर अभी तक पढना नहीँ सीखा।"
तभी रामचन्द्र का दूसरा पुत्र पानी ले आया। उम्मीदवार महोदय ने पानी का गिलास उठाया, पानी पूर्णतः दूषित था।
   "चाचा, पानी तो साफ मंगवा लेते।"- एक कार्यकर्ता बोला।
   "जब हम सब गाँव वाले यह पानी पी सकते हैँ।" रामचन्द्र ने आक्रोश से कहा-"तो नेताजी क्यो नहीँ पी सकते ?"
   "भाई साहब यह समय बहस का नहीँ है, चुनाव के बाद आप की सभी समस्यायेँ सुनी जाएंगी।"- एक कार्यकर्ता ने कहा।
रामचन्द्र ने कहा-"आम आदमी के पास यही समय होता है, अपनी बात कहने का, चुनाव के बाद यहां कोई नहीँ सुनने वाला। जब आपकी सरकार थी तब परिवर्तन नहीँ ला सके तो अब वोट मांगने का आपको क्या अधिकार है ?"
रामचन्द्र के इस प्रश्न से वहां नीरवता व्याप्त हो गई। इस प्रश्न का किसी के पास उत्तर नहीँ था।।
   -लघुकथा अभिव्यक्ति (जु.-सित. 2012) जबलपुर, मध्य प्रदेश से प्रकाशित। 


    आश्रय
संध्या को पक्षियोँ का समूह अपने नीङोँ को लौट चला। अधिकतर पक्षियोँ के नीङ मन्दिर की दीवारोँ एवं प्रागण मेँ खङे पेङोँ पर हैँ। कभी- कभी श्रद्धालु मन्दिर मेँ बने चबूतरे पर दाने डाल देते हैँ। पानी की उचित व्यवस्था भी है। अतः मन्दिर मेँ असंख्य पक्षियोँ का निवास है।
    आज जब पक्षियोँ का समूह शाम को लौटा तो हैरान रह गया। सभी पक्षियोँ के घोँसले जमीन पर बिखरे पङे थे। किसी के अण्डे तो किसी के बच्चे हताहत पङे थे।
    मन्दिर मेँ सफाई अभियान के अन्तर्गत पक्षियोँ के घोँसलोँ को नष्ट कर दिया गया। पेङोँ की शाखाऐँ काट दी गई। आसमान मेँ उङते पक्षियोँ की आँखोँ मेँ अश्रु आ गये।
   "हम तो भगवान के आश्रय मेँ बैठे थे। क्या पता था हम यहाँ भी सुरक्षित नहीँ।" -कबूतर ने कहा।
   "मनुष्य तो अब घरोँ मेँ भी घोँसले नहीँ बनाने देता।"- चिङिया बोली।
   "हाँ, अब तो सभी घर पक्के बन गए। हमारे आश्रय छिन गए।"- दूसरी चिङिया ने समर्थन किया।
   "हमारा तो जिस पेङ मेँ कोटर था, वह पेङ ही काट दिया।"- मैना बोली।
  अश्रुपूर्ण नेत्रोँ से कबूतर ने कहा,- "मेरे नन्हे-नन्हे बच्चे मर गये।"
अपना आश्रय छिन जाने से सभी पक्षी नैराश्य मेँ डूब गये।
    "अब हम क्या करेँ ?" सभी पक्षियोँ का एक ही प्रश्न था।
   "अब यहाँ रहने का क्या औचित्य।"- कबूतर ने कहा- "चलो कहीँ नये घर की तलाश मेँ चलते हैँ।"
    सभी पक्षियोँ ने पुनः अश्रुपूर्ण नेत्रोँ से अपने घोँसलोँ को देखा। पक्षियोँ के नेत्रोँ से अश्रु मन्दिर पर टपकने लगे मानो भगवान को अर्ध्य दे रहे होँ। पक्षियोँ का समूह नैराश्य से नये आश्रय की तलाश मेँ वहाँ से उङ चला।।
     जर्जर कश्ती (नव.2012) अलीगढ, उत्तर प्रदेश से प्रकाशित।

6 टिप्‍पणियां:

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

मानव की असंवेदनशीलता का उदाहरण है दोनों रचना, चाहे नेता के रूप में हो या पक्षियों का आश्रय मिटाने के रूप में. दोनों लघु कथा बहुत अच्छी है. शुभकामनाएँ.

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

आज के समय की मानसिकता का सही चित्र उकेरा है

Gurpreet Singh ने कहा…

अपने अमूल्य विचार प्रस्तुत करने हेतु, धन्यवाद।
-गुरप्रीत सिँह.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

सुंदर लघु कथाएँ।

expression ने कहा…

दोनों कथाएं मन को छूती हैं....
शुभकामनाएं.

सादर
अनु

Lalit Sevta ने कहा…

लघुकथाएँ अच्छी लगी।